मार्क्स की कलम से
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सितम्बर 16, 2008
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सितम्बर 14, 2008
ट्रेड-यूनियनवादी और सामाजिक-जनवादी राजनीति :
व्ला.इ. लेनिन
“…..मजदूरों में राजनीतिक वर्ग-चेतना बाहर से ही लाई जा सकती है, यानी केवल आर्थिक संघर्ष के बाहर से, मजदूरों और मालिकों के संबंधों के क्षेत्रों के बाहर से | वह जिस एकमात्र क्षेत्र से आ सकती है, वह राज्यसत्ता तथा सरकार के साथ सभी वर्गों तथा संस्तरों के संबंधों का क्षेत है, वह सही वर्गों के आपसी संबंधों का क्षेत्र है| इसलिए इस स्वाल का जवाब कि मजदूरों तक राजनीतिक ज्ञान ले जाने के लिए क्या करना चाहिए, केवल यह नहीं हो सकता कि “मजदूरों के बीच जाओ” –अधिकतर व्यवहारिक कार्यकर्ता, विशेषकर वे लोग ,जिनका झुकाव अर्थवाद की ओर है, यह जवाब देकर ही संतोष कर लेते है| मजदूरों तक राजनीतिक ज्ञान ले जाने के लिए सामाजिक-जनवादी कार्यकर्ताओं को आबादी के सभी वर्गों के बीच जाना चाहिए और अपनी सेना की टुकड़ियों को सभी दिशाओं में भेजना चाहिए|हमने इस बेडौल सूत्र को जान-बूझकर चुना है, हमने जान-बूझकर अपना मत अति सरल , एकदम दो-टूक ढंग से व्यक्त किया है–इसलिए नहीं कि हम विरोधाभासो का प्रयोग करना चाहते है बल्कि इसलिए कि हम अर्थवादियों के वे काम करने की “प्रेरणा देना ” चाहते है जिसे समझने से वे इनकार करते हैं| अतएव हम पाठकों से प्रार्थना करेंगे कि वे झुंझलाएँ नहीं, बल्कि अंत तक हमारी बात ध्यान से सुने |
पिछले चन्द बरसों से जिस तरह का सामाजिक-जनवादी मंडल सबसे अधिक प्रचलित हो गया है, उसे ही ले लीजिए और उसके काम की जाँच कीजिए | ” मज़दूरों के साथ ” उसका संपर्क रहता है और वह इससे संतुष्ट रहता है, वह पर्चे निकालता है, जिनमे कारखाने में होने वाले अनाचरों, पूंजीपतिओं के साथ सरकार के पक्षपात और पूलिस के ज़ुल्म की निंदा की जाती है| मजदूरों की सभाओं में जो बहस होती है, वह इन विषयों के कभी बाहर नहीं जाती या जाती भी है, तो बहुत कम| ऐसा बहुत कम देखने में आता है कि क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास के बारे में, हमारी सरकार की घरेलू तथा विदेश नीति के प्रश्नों के बारे में, रूस तथा यूरोप के आर्थिक विकास की समस्याओं के बारे में और आधुनिक समाज में विभिन्न वर्गों की स्थिति के बारे में भाषणों या वाद विवादों का संगठन किया जाता हो| और जहाँ तक समाज के अन्य वर्गों के साथ सुनियोजित ढंग से संपर्क स्थापित करने और बढ़ाने की बात है,उसके बारे में तो कोई सपने में भी नहीं सोच सकता| वास्तविकता यह है कि इन मंडलों के अधिकतर सदस्यों की कल्पना के अनुसार आदर्श नेता वह है जो एक समाजवादी राजनीतिक रूप में नहीं बल्कि ट्रेड यूनियन के रूप में अधिक काम करता है क्योंकि हर ट्रेड यूनियन का, मिसाल के लिए, किसी ब्रिटिश ट्रेड यूनियन का, सचिव आर्थिक संघर्ष चलाने में हमेशा मजदूरों की मदद करता है |वह कारखानों में होने वाले अनाचारों का भंडाफोड़ करने में मदद करता है,उन क़ानूनों तथा कदमों के अनौचित्य का पर्दाफाश करता है;जिनसे हड़ताल करने और धरना देने की स्वतंत्रता पर आघात होता है;वह मजदूरों को समझता है कि पन्च-अदालत का जज ,जो स्वयं बुर्जुआ वर्गों से आता है,पक्षपातपूर्ण होता है,आदि-आदि| सारांश यह है कि ”मालिकों तथा सरकार के खिलाफ आर्थिक संघर्ष” ट्रेड यूनियन का प्रत्येक सचिव चलता है और उसके संचालन में मदद करता है| पर इस बात को हम जितना ज़ोर देकर कहें तोड़ा है कि बस इतने ही से सामाजिक-जनवाद नहीं हो जाता,कि सामाजिक जनवादी का आदर्श ट्रेड यूनियन का सचिव नहीं, बल्कि एक ऐसा जन नायक होना चाहिए, जिसमें अत्याचार और उत्पीड़न के प्रत्येक उदाहरण से, वह चाहे किसी भी स्थान पर हुआ हो और उसका चाहे किसी भी वर्ग या संस्तर से संबंध हो, विचलित हो उठने की क्षमता हो; उसने इन तमाम उदाहरणों का सामान्यीकरण करके पुलिस की हिंसा तथा पूंजीवाद शोषण का एक अविभाज्य चित्र बनाने की क्षमता होनी चाहिए; उसमे प्रत्येक घटना का, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो, लाभ उठाकर अपने समाजवादी विश्वासों तथा अपनी जनवादी माँगों को सभी लोगों को समझा सकने और सभी लोगों को सर्वहारा के मुक्ति-संग्राम का विश्व ऐतिहासिक महत्व समझा सकने की क्षमता होनी चाहिए| उदाहरण के लिए, (इंग्लैंड की सबसे शक्तिशाली ट्रेड यूनियानो में से एक, बॉयलर-मेकर्स सोसायटी के विख्यात सचिव एवम् नेता ) राबर्ट नाइट जैसे नेता की विल्हेल्म लीब्कनेख्त जैसे नेता से तुलना करके देखिए और इन दोनो पर उन अंतरों को लागू करने की कोशिश कीजिए, जिनमें मार्तीनोव नें ‘ईस्क्रा ‘ ( ‘चिंगारी’- रूसी भाषा में मजदूरों का क्रांतिकारी अख़बार ) के साथ अपने मतभेदों को प्रकट किया है| आप पायेंगे — मैं मार्तीनोव के लेख पर नज़र डालना शुरू कर रहा हूँ –कि जहाँ राबर्ट नाइट ”जनता का कुछ ठोस कार्रवाईयों के लिए आह्वान ” ज़्यादा करते थे,वहाँ विल्हेल्म लीब्कनेख्त “सारी वर्तमान व्यवस्था का या उसकी आंशिक अभिव्यक्तियों का क्रांतिकारी स्पष्टीकरण” करने की और अधिक ध्यान देते थे; जहाँ राबर्ट नाइट ‘सर्वहारा की तात्कालिक माँगों को निर्धारित करते थे तथा उनको प्राप्त करने के उपाए बताते थे” वहाँ विल्हेल्म लीब्कनेख्त यह करने के साथ-साथ “विभिन्न विरोधी संस्तरों की सक्रिय गतिविधियों का संचालन करने” तथा “उनके लिए काम का एक सकारात्मक कार्यक्रम निर्दिष्ट करने” से नहीं हिचकते थे; राबर्ट नाइट ही थे, जिन्होनें “जहाँ तक संभव हो, आर्थिक संघर्ष को ही राजनीतिक रूप देने” की कोशिश की और वह “सरकार के सामने ऐसी ठोस माँगें रखने में, जिनसे कोई ठोस नतीजा निकलने की उमीद हो”, बड़े शानदार ढंग से कामयाब हुए; लेकिन लीब्कनेख्त “एकांगी” ढंग का “भंडाफोड़” करने में अधिक मात्रा में लगे रहते थे; जहाँ राबर्ट नाइट “नीरस दैनिक संघर्ष की प्रगति” को अधिक महत्व देते थे, वहाँ लीब्कनेख्त ”आकर्षक एवम् पूर्ण विचारों के प्रचार” को ज़्यादा महत्वपूर्ण समझते थे; जहाँ लीब्कनेख्त ने अपनी देखरेख में निकलने वाले पत्र को ”क्रांतिकारी विरोध पक्ष का एक ऐसा मुखपत्र बना दिया था, जिसने हमारी देश की अवस्था का, विशेषतया राजनीतिक अवस्था का,जहाँ तक वह आबादी के सबसे विविध संस्तरों के हितों से टकराती थी, भंडाफोड़ किया”, वहाँ राबर्ट नाइट ”सर्वहारा वर्ग के संघर्ष के साथ घनिष्ठ और सजीव संपर्क रखते हुए मजदूर वर्ग के ध्येय के लिए काम करते थे–यदि “घनिष्ठ और सजीव संपर्क” रखने का मतलब स्वयंस्फूर्ति की पूजा करना है, जिस पर हम ऊपर क्रिचेव्स्की तथा मार्तीनोव के उदाहरण का उपयोग करते हुए विचार कर चुके हैं–और “अपने प्रभाव के क्षेत्र को सीमित कर लेते थे”, क्योंकि मार्तीनोव की तरह उनका भी यह विश्वास था कि ऐसा करके वह “उस प्रभाव को ही गहरा बना देते थे”| संक्षेप में, आप देखेंगे कि मार्तीनोव सामाजिक-जनवाद को ट्रेड-यूनियनवाद के स्तर पर उतार लाते हैं, हालाँकि वह ऐसा स्वभावत: इसलिए नहीं करते कि वह सामाजिक-जनवाद का भला नहीं चाहते, बल्कि केवल इसलिए करते हैं कि प्लेखानोव को समझने की तकलीफ़ गवारा करने की बजाय उन्हें प्लेखानोव को और ग़ूढ बनाने की जल्दी पड़ी हुई है |….. ‘क्या करें ?’ का एक अंश
सितम्बर 14, 2008
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